मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली की जीवनी – Altaf Hussain Hali Biography Hindi

June 24, 2019
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अल्ताफ हुसैन हाल उर्दू के प्रमुख कवि और लेखक थे। उनका नाम उर्दू साहित्य में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। वे सर सैयदअहमद खान के मित्र और अनुयायी भी थे। अल्ताफ हुसैन ने मुस्लिम समाज को एकरूपता से नहीं, बल्कि उसके विभिन्न वर्गो व विभिन्न परतों को पहचान है। हाली समाज को केवल समीन्यीकरण में नहीं बल्कि उसकी विशिष्टता में पहचानते थे। उन्होंने उर्दू में प्रचलित परंपरा से हटकर गजल ,नज्म, रुबाईया व मर्सिया आदि लिखे हैं। हाली ने मिर्ज़ा ग़ालिब की जीवनी के साथ-साथ कई किताबें भी लिखी है। आज इस आर्टिकल में हम आपको मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली की जीवनी – Altaf Hussain Hali Biography Hindi के बारे में बताने जा रहे है.

मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली की जीवनी – Altaf Hussain Hali Biography Hindi

मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली की जीवनी

जन्म

अल्ताफ हुसैन हाली का जन्म 11 नवंबर 1837 ई. पानीपत(हरियाणा) में हुआ था। उनके पिता का नाम ईजद बख्श और उनकी माता का नाम इमत्ता-उल-रसूल था। इन के जन्म के कुछ समय बाद ही इनकी माता का देहांत हो गया। जब हाली नौ वर्ष के थे तो उनके पिता का भी देहांत हो गया। इन हालातों के कारण उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध नहीं हो सका। परिवार में पढ़े-लिखे लोग होने के कारण उन्हें अरबी व फारसी का ज्ञान प्राप्त का। हाली के मन में अध्ययन के प्रति गहरा लगाव था। हाली के एक भाई और दो बहने थी जो उनसे बड़े थे उनका नाम इमदाद हुसैन, इम्ता-उल-हुसैन और वजीह-उल-निसां। इन्होंने हाली के विरुद्ध उनका विवाह इस्लाम-उल-निसां से कर दिया। अल्ताफ हुसैन हाली के दो बेटे और एक बेटी थी। हाली अपने बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं समझते थे.

शिक्षा

अल्ताफ हुसैन हाली अपने पारिवारिक स्थितियों के कारण व्यक्ति अध्ययन के शौक को जारी रखने के अनुकूल में नहीं थे। 17 वर्ष की उम्र में घर से दिल्ली के लिए निकल पड़े लेकिन यहां पर भी वे अपने अध्ययन को व्यवस्थित ढंग से नहीं चला सके। इसके बारे में उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हाली की कहानी हाली की जुबानी’ में बड़े ही पश्चाताप से लिखा की ‘डेढ वर्ष दिल्ली में रहते हुए मेंने कॉलेज को कभी आंख से देखा भी नहीं’। 1856 में वह वापस पानीपत लौट आए। यहां आकर उन्होंने हिसार जिलाधीश के कार्यालय में नौकरी की। 1857 के स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान अन्य जगह की तरह हिसार में भी अंग्रेजी शासन व्यवस्था समाप्त हो गई थी और उन्हें घर आना पड़ा।

1863 में नवाब मोहम्मद मुस्तफा खां शेफ्ता के बेटे को शिक्षा देने के लिए अल्ताफ जहांगीराबाद चले गए। 1869 नवाब से पिता की मृत्यु हो गई। जिसके कारण हाली को रोजगार के सिलसिले में लाहौर जाना पड़ा। वहां पर पंजाब गवर्नमेंट बुक डिपो पर किताबों की भाषा ठीक करने की नौकरी की। चार साल नौकरी करने के बाद एंगलो अरेबिक कॉलेज दिल्ली में फारसी अरबी भाषा के मुख्य अध्यापक के तौर पर कार्य करना शुरू कर दिया। 1885 में उन्होंने इस पद से त्यागपत्र दे दिया।

रचनाएं

अल्ताफ हुसैन हाली ने कई रचनाएं की जिनमें से कई प्रमुख है- मूसद्द्स-ए -हाली, यादगार- ए- हाली, हयात- ए- हाली , हयात ए जावेद आदि रचनाएं प्रमुख है

हुसैन हाली और मिर्जा गालिब के जीवन के ढंग में बड़ा अंतर था। हाली पाखंड की कड़ी आलोचना करते हुए एक पक्के मुसलमान का जीवन जीते थे। मिर्जा गालिब ने शायद ही कभी नमाज पढ़ी हो. मिर्जा गालिब के प्रति उनके दिल में बहुत आदर सम्मान था

मृत्यु

अल्ताफ हुसैन हाली की मृत्यु 76 साल की उम्र में 30 सितंबर 1914 को पानीपत में हुई थी।

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