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आशापूर्णा देवी की जीवनी – Ashapoorna Devi Biography Hindi

आशापूर्णा देवी भारत से बांग्ला भाषा की कवियत्री और एक उपन्यासकार थी। उन्होंने 13 साल की उम्र से लिखना शुरू किया। और अंतआजीवन में तक साहित्य रचना से जुड़ी रही। उन्होंने गृहस्थ जीवन के साथ-साथ अपने सारे दायित्व को निभाते हुए लगभग 200 से ज्यादा कृतिया लिखी। जिनमें से कई कृतियों का कई भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको आशापूर्णा देवी की जीवनी – Ashapoorna Devi Biography Hindi के बारे में बताएंगे

आशापूर्णा देवी की जीवनी – Ashapoorna Devi Biography Hindi

आशापूर्णा देवी की जीवनी

जन्म

आशापूर्णा देवी का जन्म 8 जनवरी 1999 का पोटोलडांगा, कोलकाता, भारत में हुआ था। उनका परिवार कट्टरपंथी था। एक मध्यवर्गीय परिवार से थी। उनके परिवार में माता-पिता और तीन भाई थे।  आशापूर्णा के पिता एक चित्रकार थे और उनकी माता के बांग्ला साहित्य में गहरी रुची थी। पिता की चित्रकारी में रूचि और मां के साहित्य प्रेम की वजह से आशापूर्णा देवी को उसमें के जाने-माने साहित्यकार और कला शिल्पियों से करीब से जानने  का अवसर मिला। उस युग में बंगाल में सभी निषेधों का बोलबाला था। पिता और पति दोनों के घर में पर्दा के बंधन थे पर घर के झरोखों से मिली झलक से ही वे संसार में घटित होने वाली घटनाओं की कल्पना कर लेती थी

शिक्षा

आशापूर्णा देवी को स्कूल या कॉलेज जाने का कोई अवसर नहीं मिला।  लकिन बचपन से ही उन्हें पढ़ने लिखने का शौक था और अपने विचारों की व्यक्त करने की सुविधाएं प्राप्त हुई। अपने घर में नियमित रूप से अनेक बांग्ला पत्रिकाएं जैसे प्रवासी, भारत वर्ष, भारती, मानसी-ओ मर्मबानी, अर्चना, साहित्य, सबूज पत्र आदि आती थी। जिनका अध्ययन और चिंतन उनके लेखन की नींव बना। उन्होंने 13 वर्ष की आयु से लिखना शुरू किया और आजीवन साहित्य रचना से जुड़ीं रहीं। कला और साहित्यिक परिवेश की वज़ह से उनमें संवेदनशीलता का भरपूर विकास हुआ।

साहित्यक करियर

आशापूर्णा देवी की कर्मभूमि पश्चिमी बंगाल थी। उनका पहला कहानी-संकलन “जल और जामुन” 1940 में से पश्चिमी बंगाल प्रकाशित हुआ था। उस समय कोई नहीं जानता था कि न केवल बंगाली, बल्कि भारतीय कथा साहित्य के मंच पर एक ऐसे नक्षत्र का प्रकटीकरण हुआ है, जिससे लंबे समय तक समाज की कुंठा, संकट, संघर्ष, जुगुप्सा और लोपा सब एक साथ रहे। सामाजिक संबंधों की खुशी, उल्लास और समृद्धिका नया आकाश प्रदान करेगी। उनकी कहानियां पात्रों, संवादों या घटनाओं का संग्रह नहीं हैं, लेकिन वे जीवन की किसी भी अनकही व्याख्या को परिभाषित करते हैं और उनकी इस रूप में पूरी तरह से अलग पहचान है।

उनकी अपनी एक विशिष्ट शैली थी। चरित्रों का रेखांकन और उनके मनोभावों को व्यक्त करते समय वे यथार्थवादिता को बनाये रखती थीं। सच को सामने लाना उनका मूल उद्देश्य  था। उनका लेखन आशावादी दृष्टिकोण लिए था। उनके उपन्यास मुख्यरूप से नारी पर केन्द्रित रहे हैं। उनके उपन्यासों में जहाँ नारी मनोविज्ञान की सूक्ष्म अभिव्यक्ति और नारी के स्वभाव उसके दर्प, दंभ, द्वंद और उसकी दासता का बखूबी चित्रण किया हुआ है वहीँ उनकी कथाओं में पारिवारिक प्रेम संबंधों की उत्कृष्टता दिखाई देती है। उनकी कथाओं में तीन मुख्य विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं – वक्तव्य प्रधान, समस्या प्रधान और आवेग प्रधान। उनकी कथाएं हमारे घर संसार का विस्तार हैं। जिसे वे कभी नन्ही बेटी के रूप में तो कभी एक किशोरी के रूप में तो कभी ममता से पूर्ण माँ के रूप में नवीन जिज्ञासा के साथ देखती हैं।

उनको अपनी प्रतिभा के कारण उन्‍हें समकालीन बांग्‍ला उपन्‍यासकारों की प्रथम पंक्‍ति में गौरव से भरा स्‍थान मिला। उनके लेखन की विशिष्‍टता उनकी एक अपनी ही शैली है। कथा का विकास, चरित्रों का रेखाकंन, पात्रों के मनोभावों से अवगत कराना, सबमें वह यथार्थवादिता को बनाए रखते हुए अपनी आशामयी दृष्‍टि को व्यक्त करती हैं। इसके पीछे उनकी शैली विद्यमान रहती है। वे यथार्थवादी, सहज और संतुलित थी। सीधे और कम शब्दों में बात को ज्यों का त्यों कह देना उनकी विशेषता थी। उनकी निरीक्षण शक्ति गहन और पैनी थी और विचारों में गंभीरता थी। पूर्वाग्रहों से रहित उनका दृष्टिकोण अपने नाम के अनुरूप आशावादी था। वे मानव से प्यार करती थी। वे विद्रोहिणी थी। ‘मैं तो सरस्वती की स्टेनो हूँ’ उनका यह कथन उनकी रचनाशीलता का परिचय देता है। उन्होने अपने87 वर्ष के दीर्घकाल में100 से भी अधिक औपन्यासिक कृतियों की रचना की, जिनके माध्यम से उन्होंने समाज केकई पक्षों को उजागर किया। उनके विपुल कृतित्‍व का उदाहरण उनकी लगभग 225 कृतियां हैं। उनकी समग्र रचनाओं ने बंकिम, रवीन्द्र और शरत् की त्रयी के बाद बंगाल के पाठक वर्ग और प्रबुद्ध महिला पाठकों को सर्वाधिक प्रभावित और समृद्ध किया है।

कृतियाँ

उपन्‍यास-

  • प्रेम ओ प्रयोजन – 1944 में
  • अग्‍नि-परिक्षा – 1952 में
  • छाड़पत्र – 1959 में
  • प्रथम प्रतिश्रुति – 1964 में
  • सुवर्णलता – 1966 में
  • मायादर्पण – 1966 में
  • बकुल कथा – 1974 में
  • उत्‍तरपुरुष – 1976 में
  • जुगांतर यवनिका पारे – 1978 में

कहानी-

  • जल और आगुन, 1940 में
  • आर एक दिन, 1955 में
  • सोनाली संध्‍या, 1962 में
  • आकाश माटी, 1975 में
  • एक आकाश अनेक तारा, 1977 में

किशोर उपन्यास

  • राज कुमार एर पोशाके
  • गज उकील एर हत्या रहस्य
  • भूतर कुकुर
  • लोंका मोरिच हे एक मोहमनब (मार्च 1983)
  • मानुषेर मोटों मानुष
  • चारा पुते गेलेन ननतु पिसे (1987)
  • बोमार छेए बिशम
  • सोमूदूर देखा (1988)
  • अलोय आदित्यर इछ्छा पोट्रो रहस्यो
  • हरनों थेके प्राप्ति

पुरस्कार

  • लीला पुरस्कार, कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1954 में मिला.
  •  1964 में टैगोर पुरस्‍कार से सम्मानित किया गया.
  • भूटान मोहिनी दासी स्वर्ण पदक 1966 में नवाजा गया.
  • बूँद मेमोरियल पुरस्कार, पश्चिम बंगाल सरकार से 1966 में मिला.
  • 1976में उन्हे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
  • ज्ञानपीठ पुरस्कार, प्रथम प्रतिश्रुति के लिए 1976 में नवाजा गया.
  • बंगीय साहित्य परिषद से 1988 में हरनाथ घोष पदक, सम्मानित किया गया.
  • जगतरानी स्वर्ण पदक, कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1993 में सम्मानित किया गया.

मृत्यु

प्रख्यात उपन्यासकार आशापूर्णा देवी की मृत्यु 13 जुलाई, 1995 को हुआ।

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