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राजा छत्रसाल की जीवनी – Raja Chhatrasal Biography Hindi

छत्रसाल भारत के मध्ययुग के एक प्रतापी योद्धा थे जिन्होने मुगल शासक औरंगजेब से युद्ध करके बुन्देलखण्ड में अपना राज्य स्थापित किया और ‘महाराजा’ की पदवी प्राप्त की। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको राजा छत्रसाल की जीवनी – Raja Chhatrasal Biography Hindi के बारे में बताएगे।

राजा छत्रसाल की जीवनी – Raja Chhatrasal Biography Hindi

राजा छत्रसाल की जीवनी

जन्म

बुंदेलखंड के शिवाजी के नाम से प्रख्यात छत्रसाल का जन्म 4 मई 1649 को एक पहाड़ी ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम चंपत राय था और उनकी माता का नाम लालकुँवरि था। चंपत राय बहुत ही वीर बहादुर योद्धा थे। युद्ध क्षेत्र में लालकुंवरि भी चंपत राय के साथ में ही रहती थी और अपने पति को उत्साहवर्धन करती थी। छत्रसाल का गर्भस्थ जीवन तलवारों की खनक और युद्ध की मारकाट के बीच हुआ। युद्ध के प्रभाव उनके जीवन पर असर डालते हैं माता लालकुंवरि की धर्म और संस्कृति से संबंधित कहानियां बालक छत्रसाल को और भी बहादुर बनाती रही।

युद्ध कौशल की शिक्षा

पांच वर्ष में ही इन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा के लिए अपने मामा साहेबसिंह धंधेर के पास देलवारा भेज दिया गया था। माता-पिता के निधन के कुछ समय के बाद ही वे बड़े भाई अंगद राय के साथ देवगढ़ चले गये। बाद में अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या देवकुंअरि से विवाह किया। उसने अपने भाई के साथ पिता के दोस्त राजा जयसिंह के पास पहुंचकर सेना में भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया।

राजा जयसिंह तो दिल्ली सल्तनत के लिए कार्य कर रहे थे इसलिए औंरगजेब ने जब उन्हें दक्षिण विजय का कार्य सौंपा तो छत्रसाल को इसी युद्ध में अपनी बहादुरी दिखाने का पहला अवसर प्राप्त हुआ। मई 1665 में बीजापुर युद्ध में छत्रसाल ने असाधारण वीरता दिखायी और देवगढ़ (छिंदवाड़ा) के गोंडा राजा को पराजित करने के लिए छत्रसाल ने जी-जान लगा दी । इस समय यदि उनका घोड़ा, जिसे बाद में ‘भलेभाई’ के नाम से विभूषित किया गया उनकी रक्षा न करता तो  शायद छत्रसाल जीवित न बचते। इतन ही नहीं जब विजयश्री का सेहरा उनके सिर पर न बांध मुगल भाई-भतीजेवाद में बंट गया तो छत्रसाल के स्वाभिमान को ठेस पहुंची और उन्होंने मुगलों की बदनीयती समझ दिल्ली सल्तनत की सेना छोड़ दी।

उन दिनों राष्ट्रीयता के आकाश पर छत्रपति का सितारा चमचमा रहा था। छत्रसाल दुखी तो थे ही, उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज से मिलना ही इन परिस्थितियों में उचित समझा और 1668 में दोनों राष्ट्रवीरों की जब मुलाकात हुई तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियों का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी।
करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।
दौर देस मुगलन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने
करि हो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें
तो सब सुयस हमारे भाषें।

शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर 1670 में छत्रसाल वापिस अपनी मातृभूमि लौट आये लेकिन उस समय बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल मिन्न थीं। अधिकतर रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसाल के भाई-बंधु भी दिल्ली से भिड़ने को तैयार नहीं थे। स्वयं उनके हाथ में धन-संपत्ति कुछ नहीं था । दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया पर बादशाह से बैर न करने की ही सलाह भी दी। ओरछेश सुजान सिंह ने अभिषेक तो किया पर संघर्ष से अलग रहे। छत्रसाल के बड़े भाई रतनशाह ने साथ देना स्वीकार नहीं किया तब छत्रसाल ने राजाओं के बजाय जनोन्मुखी होकर अपना कार्य शुरू किया। कहते हैं उनके बचपन के साथी महाबली तेली ने उनकी धरोहर, थोड़ी-सी पैत्रिक संपत्ति के रूप में वापस की जिससे छत्रसाल ने 5 घुड़सवार और 25 पैदलों की छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि॰सं॰ 1728 (1671) के शुभ मुहूर्त में औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापना का बीड़ा उठाया।

औरंगजेब से युद्ध

औरंगजेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। उसने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हजार सैनिकों की टुकडी मुगल सरदारों के साथ छत्रसाल का पीछा करने के लिए भेजी थी। छत्रसाल अपने रणकौशल व छापामार युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ाता रहा। छत्रसाल को मालूम था कि मुगल छल करके घेराबंदी करने में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुगल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित कई स्थानों पर लड़ाई लड़ी। छत्रसाल की शक्ति बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुगल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। बुन्देलखंड से मुगलों का   एकछत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।

राज्याभिषेक

छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन मिला था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने छत्रसाल को ‘राजा’ की मान्यता प्रदान की थी। उसके बाद छत्रसाल ने ‘कालिंजर का क़िला’ भी जीत लिया और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में राजधानी स्थापित की। विक्रम संवत 1744 में योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया था।

छत्रसाल के साहस और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन,हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली की ओर रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया था। मुराद ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे। छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ आजीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के संदेश देते रहे। उनके द्वारा दिये गये उपदेश ‘कुलजम स्वरूप’ में एकत्र किये गये। पन्ना में प्राणनाथ का समाधि स्थल है जो अनुयायियों का तीर्थ स्थल भी है। प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। किंवदन्ती है कि जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी वह धरा धनधान्य, रत्न संपन्न हो गयी। छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ गर्व के साथ दोहरायी जाती है- ‘इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोस छत्रसाल सों लरन की रही न काहूहौस।’

छत्रसाल अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा। 1729 में सम्राट मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, जालौन, सेवड़ा, सोपरी पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, सेहुड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। उनका पुत्र हृदयशाह भी उदासीन होकर अपनी जागीर में बैठा रहा। तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा –

जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आय
बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा और उसने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

साहित्य संरक्षक

छत्रसाल साहित्य के प्रेमी एवं संरक्षक थे। कई प्रसिद्ध कवि उनके दरबार में रहते थे। कवि भूषण उनमें से एक थे जिन्होने छत्रसाल दशक लिखा है। इनके अलावा लाल कवि, बक्षी हंशराज आदि भी थे।

मृत्यु

20 दिसम्बर 1731 राजा छत्रसाल की मृत्यु हो गयी।

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