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हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की जीवनी – Hanuman Prasad Poddar Biography Hindi

हनुमान प्रसाद पोद्दार ( English – Hanuman Prasad Poddar)  का नाम गीता प्रेस स्थापना करने के लिए भारत और दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

उनके द्वारा मई,1922 में गीता प्रेस का स्थापना की गई।

भारतीय अध्यात्मिक जगत पर पोद्दार जी के नाम का एक ऐसा सूर्यउदय हुआ, जिसकी वजह से देश के हर एक घर में गीता रामायण, वेद और पुराण जैसे ग्रंथ पहुंचे।

उनको प्यार से भाई जी कहकर भी बुलाते हैं।

उन्होंने गीता पर एक टीका लिखी और उसे कोलकाता के ‘वाणिक प्रेस’ में छपवाई। पहले  ही संस्करण की 5000 प्रतियां बिक गई थी। परंतु पोद्दार जी को इस बात का दुख हुआ कि इस पुस्तक में बहुत सी गलतियां थी।

इसके बाद उन्होंने इसका संशोधित संस्करण निकाला मगर इसमें भी गलतियां दोहराई गई थी।

इस बात से उनके मन को गहरा धक्का लगा और उन्होंने यह फैसला किया कि जब तक अपना खुद का प्रेस नहीं होगा यह कार्य आगे नहीं बढ़ाएंगे।

आज गीता प्रेस गोरखपुर का नाम किसी भी भारतीय के लिए यह नाम अनजान नहीं है।

इस देश में और दुनिया के हर कोने में रामायण, गीता, वेद, पुराण उपनिषद से लेकर प्राचीन भारत के ऋषि और मुनियों की कथाओं को पहुंचाने का एकमात्र श्री गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार को ही जाता है।

1906 में उन्होंने कपड़ों में गाय की चर्बी के प्रयोग किए जाने के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया और विदेशी वस्तुओं और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए संघर्ष छेड़ दिया।

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की जीवनी – Hanuman Prasad Poddar Biography Hindi

Hanuman Prasad Poddar Biography Hindi
Hanuman Prasad Poddar Biography Hindi

संक्षिप्त विवरण

नामहनुमान प्रसाद
पूरा नामहनुमान प्रसाद पोद्दार
जन्म1892
जन्म स्थान रतनगढ़, राजस्थान
पिता का नामलाला भीमराज अग्रवाल
माता का नामरिखीबाई
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिन्दू
जाति

जन्म

Hanuman Prasad Poddar का जन्म 1892 में राजस्थान के रतनगढ़ में हुआ था।

उनके पिता का नाम लाला भीमराज अग्रवाल और उनकी माँ का नाम रिखीबाई था। वे दोनों हनुमान के भगत थे, तो उन्होंने अपने बेटे का नाम हनुमान प्रसाद रख दिया।

जब वे 2 वर्ष के थे तो उनकी माता की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उनका लालन-पालन उनकी दादी ने ही किया था।

उनकी दादी के धार्मिक संस्कारों के बीच हनुमान प्रसाद को बचपन से ही गीता, रामायण, वेद, उपनिषद और पुराणों की कहानियां पढ़ने और सुनने को मिलती थी।

इन संस्कारों का उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा और उन्हें बचपन में ही हनुमान कवच का पाठ सिखाया गया था।

दीक्षा

Hanuman Prasad Poddar को निवारक संप्रदाय के ‘संत ब्रजदास जी’ ने दीक्षा दी थी।

करियर

जब देश ग़ुलामी की जंज़ीरों मे जकड़ा हुआ था। उनके पिता अपने कारोबार के चलते कलकत्ता में थे और वे अपने दादा जी के साथ असम में थे।

कलकत्ता में भाई जी स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास, पं, झाबरमल शर्मा के संपर्क में आए और आज़ादी आंदोलन में कूद पड़े।

इसके पश्चात लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जब कलकत्ता आए तो पोद्दार जी उनसे मिले इसके बाद में उनकी मुलाकात गाँधी जी के साथ हुई।

वीर सावरकर द्वारा लिखित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर ग्रंथ’ से भाई जी काफी प्रभावित हुए और 1938 में वे वीर सावरकर से मिलने के लिए मुंबई चले आए।

1906 में उन्होंने कपड़ों में गाय की चर्बी के प्रयोग किए जाने के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाया और विदेशी वस्तुओं और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए संघर्ष छेड़ दिया।

युवावस्था में ही उन्होंने खादी और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना आरंभ कर दिया।

विक्रम संवत 1971 में जब महामना पंडित मदन मोहन मालवीय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन संग्रह करने के उद्देश्य से कलकत्ता आए तो पोद्दार जी ने कई लोगों से मिलकर इस कार्य के लिए दान-राशि दिलवाई।

जेल यात्राएं

कलकत्ता में आज़ादी आंदोलन और क्रांतिकारियों के साथ काम करने के एक मामले में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने हनुमान प्रसाद पोद्दार सहित कई प्रमुख व्यापारियों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

इन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के हथियारों के एक जख़ीरे को लूटकर उसे छिपाने में मदद की थी। जेल में पोद्दार जी ने हनुमान जी की आराधना करना शुरू कर दी।

इसके बाद में उन्हें अलीपुर जेल में नज़रबंद कर दिया गया। नज़रबंदी के दौरान पोद्दार जी ने समय का काफी सही उपयोग किया।

वहाँ वे अपनी दिनचर्या सुबह तीन बजे शुरू करते थे और पूरा समय परमात्मा का ध्यान करने में ही बिताते थे।

इसके बाद में उन्हें नजरबंद रखते हुए पंजाब की शिमलपाल जेल में भेज दिया गया। वहाँ कैदी मरीज़ों के स्वास्थ्य की जाँच के लिए एक होम्योपैथिक डॉक्टर जेल में आते थे, पोद्दार जी ने उस डॉक्टर से होम्योपैथी की बारीकियाँ सीख ली और होम्योपैथी की किताबों का अध्ययन करने के बाद ख़ुद ही मरीज़ों का इलाज करने लगे।

बाद में वे जमनालाल बजाज की प्रेरणा से मुंबई चले आए। वहाँ  पर वे वीर सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महादेव देसाई और कृष्णदास जाजू जैसी विभूतियों के काफी संपर्क में आए।

खादी प्रचार मंडल

मुंबई में रहते हुए उन्होंने अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की।

इसके बाद वे प्रसिद्ध संगीताचार्य विष्णु दिगंबर के सत्संग में आए और उनके हृदय में संगीत का झरना बह निकला।

फिर उन्होंने भक्ति गीत लिखे जो ‘पत्र-पुष्प’ के नाम से प्रकाशित हुए। मुंबई में वे अपने मौसेरे भाई जयदयाल गोयन्का जी के गीता पाठ से बहुत प्रभावित थे।

उनके गीता के प्रति प्रेम और लोगों की गीता को लेकर जिज्ञासा को देखते हुए भाई जी ने इस बात का प्रण किया कि वे श्रीमद् भागवद्गीता को कम से कम मूल्य पर लोगों को उपलब्ध कराएंगे।

गीता प्रेस की स्थापना

उन्होंने गीता पर एक टीका लिखी और उसे कलकत्ता के ‘वाणिक प्रेस’ में छपवाई। उनके प्रथम ही संस्करण की 5000 प्रतियाँ बिक गई।

लेकिन पोद्दार जी को इस बात का  गहरा दु:ख  हुआ था कि इस पुस्तक में ढेरों ग़लतियाँ थी। इसके बाद उन्होंने इसका संशोधित संस्करण निकाला मगर इसमें भी ग़लतियाँ दोहरा गई थी।

इस बात से भाई जी के मन को गहरी ठेस लगी और उन्होंने तय किया कि जब तक अपना खुद का प्रेस नहीं होगा, यह कार्य आगे नहीं बढ़ेगा। बस यही एक छोटा सा संकल्प गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना का आधार बना।

उनके भाई गोयनका जी का व्यापार तब बांकुड़ा, बंगाल में था और वे गीता पर प्रवचन के सिलसिले में प्राय: बाहर ही रहा करते थे। तब समस्या यह थी कि प्रेस कहाँ लगाई जाए। उनके मित्र घनश्याम दास जालान गोरखपुर में ही व्यापार करते थे।

उन्होंने प्रेस गोरखपुर में ही लगाए जाने और इस कार्य में भरपूर सहयोग देने का आश्वासन दिया। इसके बाद मई 1922 में गीता प्रेस का स्थापना की गई।

पोद्दार जी ने कल्याण को एक आदर्श और रुचिकर पत्रिका का रुप देने के लिए देश भर के महात्माओं, लेखकों और संतों आदि को पत्र लिखकर इसके लिए विविध विषयों पर लेख आमंत्रित किए।

इसके साथ ही उन्होंने श्रेष्ठतम कलाकारों से देवी-देवताओं के आकर्षक चित्र बनवाए और उनको कल्याण में प्रकाशित किया।

कल्याण की सामग्री के संपादन से लेकर उसके रंग-रुप को अंतिम रूप देने का कार्य भी पोद्दार जी ही देखते थे। वह प्रतिदिन अठारह घंटे कार्य करते थे।

कल्याण जी को उन्होंने मात्र हिंदू धर्म की ही पत्रिका के रुप में पहचान देने की बजाय उसमे सभी धर्मों के आचार्यों, जैन मुनियों, रामानुज, निंबार्क, माध्व आदि संप्रदायों के विद्वानों के लेखों का प्रकाशन किया।

1926 में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा का अधिवेशन दिल्ली में था सेठ जमनालाल बजाज अधिवेशन के सभापति थे।

इस अवसर पर सेठ घनश्यामदास बिड़ला भी मौजूद थे। बिड़ला जी ने भाई जी द्वारा गीता के प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए उनसे आग्रह किया कि सनातन धर्म के प्रचार और सद विचारों को लोगों तक पहुँचाने के लिए एक संपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए।

बिड़ला जी के इन्हीं वाक्यों ने भाई जी को ‘कल्याण’ नाम की पत्रिका के प्रकाशन के लिए प्रेरित किया। अगस्त 1955 में कल्याण का पहला प्रवेशांक निकला।

इसके बाद ‘कल्याण’ भारतीय परिवारों के बीच एक लोकप्रिय संपूर्ण पत्रिका के रुप में स्थापित हो गई और आज भी धार्मिक जागरण में कल्याण एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

‘कल्याण’ तेरह माह तक मुंबई से प्रकाशित होती रही। इसके बाद अगस्त 1926 से गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होने लगा।

गोरखपुर की बाढ़

1936 में गोरखपुर में भयंकर बाढ़ आ गई थी। बाढ़ पीड़ित क्षेत्र के निरीक्षण के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू जब गोरखपुर आए तो तत्कालीन अंग्रेज़ सरकार के दबाव में उन्हें वहाँ किसी भी व्यक्ति ने कार उपलब्ध नहीं कराई, क्योंकि अंग्रेज़ कलेक्टर ने सभी लोगों को धौंस दे रखी थी कि जो भी नेहरू जी को कार देगा उसका नाम विद्रोहियों की सूची में लिख दिया जाएगा।

परंतु हनुमान जी ने अपनी कार नेहरू जी को दे दी।

 अकाल

1938 में जब राजस्थान में भयंकर अकाल पड़ा तो पोद्दार जी अकाल पीड़ित क्षेत्र में पहुँचे और उन्होंने अकाल पीड़ितों के साथ ही मवेशियों के लिए भी चारे की व्यवस्था करवाई।

बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, द्वारका, कालड़ी श्रीरंगम आदि स्थानों पर वेद – भवन तथा विद्यालयों की स्थापना में पोद्दार जी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपने जीवन-काल में पोद्दार जी ने 25 हज़ार से ज़्यादा पृष्ठों का साहित्य-सृजन किया।

सम्मान

  • अंग्रेजों के समय में गोरखपुर में उनकी धर्म एवं साहित्य सेवा और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उस समय के अंग्रेज कलेक्टर पेडले ने उन्हें ‘राय साहब’ की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन पोद्दार जी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
  • इसके बाद अंग्रेज कमिश्नर होबर्ट ने ‘राय बहादुर’ की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा लेकिन पोद्दार जी ने इस प्रस्ताव को भी स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
  • देश की स्वाधीनता के बाद डॉक्टर संपूर्णानंद, कन्हैयालाल मुंशी और अन्य लोगों के सलाह से तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने पोद्दार जी को भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत करने का प्रस्ताव रखा गया, परंतु उन्होंने इसमें भी कोई रुचि नहीं दिखाई थी।
  • हनुमान प्रसाद पोद्दार के सम्मान में डाक टिकट जारी की गई।

मृत्यु

Hanuman Prasad Poddar की मृत्यु 22 मार्च, 1971 को हो गई थी

Sonu Siwach

नमस्कार दोस्तों, मैं Sonu Siwach, Jivani Hindi की Biography और History Writer हूँ. Education की बात करूँ तो मैं एक Graduate हूँ. मुझे History content में बहुत दिलचस्पी है और सभी पुराने content जो Biography और History से जुड़े हो मैं आपके साथ शेयर करती रहूंगी.

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