जमनालाल बजाज की जीवनी – Jamnalal Bajaj Biography Hindi

November 06, 2019
Spread the love

जमनालाल बजाज भारत के एक उद्योगपति, मानवशास्त्री और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे महात्मा गांधी के अनुयायी थे और उनके बहुत करीबी व्यक्ति थे। गांधीजी  उन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे। जमनालाल बजाज 1920 में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष बने थे और इस पद पर वे जीवन भर रहे। उन्होंने वर्धा में ‘सत्याग्रह आश्रम’ की स्थापना की थी। इसके अलावा गौ सेवा संघ, गांधी सेवा संघ, सस्ता साहित्य मण्डल आदि संस्थाआं की स्थापना भी उनके द्वारा की गई। जमनालाल बजाज जाति-भेद के विरोधी थे और उन्होंने हरिजन उत्थान के लिए भी प्रयास किया। उनकी याद में सामाजिक क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने के लिये ‘जमनालाल बजाज पुरस्कार’ की स्थापना की गयी है। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको जमनालाल बजाज की जीवनी – Jamnalal Bajaj Biography Hindi के बारे में बताएगे ।

जमनालाल बजाज की जीवनी – Jamnalal Bajaj Biography Hindi

जन्म

जमनालाल बजाज का जन्म 9 नवम्बर, 1889 को काशी का वास, सीकर, राजस्थान में हुआ था। उनके पिता का नाम कनीराम और उनकी माता का नाम बिरदीबाई था।

जमनालाल बजाज वर्धा के एक बड़े सेठ बच्छराज के यहां पांच वर्ष की आयु में गोद लिये गये थे। सेठ वच्छराज सीकर के रहने वाले थे। उनके पूर्वज सवा सौ साल पहले नागपुर में आकर बस गये थे। विलासिता और ऐश्वर्य का वातावरण इस बालक को दूषित नहीं कर पाया, क्‍योंकि उनका झुकाव तो बचपन से अध्यात्म की ओर था। जमनालाल की सगार्इ दस साल की आयु में ही तय कर दी गई थी।  इसके तीन साल बाद जब जमनालाल 13 वर्ष के हुए और जानकी 9 वर्ष की हुर्इं, तो उनका विवाह धूमधाम से वर्धा में हुआ। जमनालाल बजाज ने खादी और स्वदेशी को अपनाया और अपने वेशकीमती वस्त्रों की होली जलार्इ।

योगदान

अखिल भारतीय कोषाध्यक्ष की हैसियत से खादी के उत्पादन और उसकी बिक्री बढ़ाने के विचार से जमनालाल बजाज ने देश के दूर-दराज भागों का दौरा किया, ताकि अर्धबेरोजगारों को फायदा पहुंच सके।1935 में गांधीजी ने ‘अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ’ की स्थापना की। इस नये संघ के लिए जमनालाल बजाज ने बडी खुशी से अपना विशाल बगीचा सौंप दिया, जिसका नाम गांधीजी ने स्वर्गीय मगनलाल गांधी के नाम पर ‘मगनाडी’ रखा। 1936 में ‘अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन’, नागपुर के बाद ही जमनालाल जी ने वर्धा में देश के पश्चिम और पूर्व के प्रांतों में हिंदी प्रचार के लिए, ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ की स्थापना की और उसके लिए राशि इकट्ठा की। इसके कुछ समय बाद वे ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’, मद्रास के अध्यक्ष चुने गये। अपने इस पद का उपयोग उन्होंने राष्ट्रभाषा आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में किया। जमनालाल जी इसके अलावा मन, प्राण से हिन्दू-मुस्लिम एकता और अछूतोद्धार के काम में जुट गये। वास्तव में वे देश के पहले नेता थे, जिन्होंने वर्धा में अपने पूर्वजों के ‘लक्ष्मीनारायण मंदिर’ के द्वार 1928 में ही अछूतों के लिए खोल दिये थे। जमनालाल बजाज और उनकी पत्नी जानकी देवी अतिथियों की पसंद का बहुत खयाल रखते थे।

त्याग की दृष्टि से जमनालाल बजाज का आखिरी कार्य सर्वश्रेष्ठ रहा। देश के पशुधन की रक्षा का काम उन्होंने अपने लिए चुना था और गाय को उसका प्रतीक माना था। इस काम में वे इतनी एकाग्रता और लगन के साथ जुट गये थे कि जिसकी कोर्इ मिसाल नहीं थी। उनका सबसे बड़ा काम गो-सेवा का था। वैसे तो यह काम पहले भी चलता था, लेकिन धीरे -धीरे से। इससे उन्हें संतोष न था। उन्होंने इसे तेज गति से चलाना चाहा और इतनी तीव्रता से चलाया कि खुद ही चल बसे। अगर हमें गाय को जिंदा रखना है तो हमें भी उसकी सेवा में अपने प्राण खोने होंगे। जमनालाल जी कार्यकर्ताओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं देते थे, वह उनके बच्चों की शिक्षा का भी प्रबंध करते थे। बीमार पड जाने पर उनकी चिकित्सा भी करवाते थे। वह ऐसे लोगों के बच्चों की सूची भी रखते थे और उनकी शादी बहुत कम खर्च में करवा देते थे। इसी कारण गांधीजी उन्हें स्नेह से “शादी काका” भी कहते थे।

1931 में जमनालाल जी के प्रयत्नों के कारण ‘जयपुर राज्य प्रजा मंडल’ की स्थापना हुर्इ। 1936 में यह मंडल सक्रिय रूप से काम करने लगा। 30 मार्च, 1938 को जयपुर राज्य ने अचानक एक आदेश निकाल दिया कि सरकार की आज्ञा के बिना जयपुर राज्य में किसी भी सार्वजनिक संस्था की स्थापना नहीं की जा सकेगी। इस आदेश का मुख्य निशाना प्रजा मंडल की गतिविधियों को व्यर्थ करना था। मंडल का वार्षिक अधिवेशन 8 मई व 9 मई को जमनालाल जी की अध्यक्षता में घोषित किया जा चुका था। उन दिनों जयपुर के एक अंग्रेज़ दीवान बीकैम्प सेंटजान को जमनालाल की लोकप्रियता पसंद नहीं थी। 4 जुलाई, 1938 को बात बहुत बढ़ गयी और जयपुर पुलिस ने एक रेलगाड़ी पर गोलियां चला दी। जिसमें कई राजपूत मारे गए और घायल हुए। सीकर के राजपूत और जाट भड़क गए और लगा कि खून की नदियां बहने लगेंगी। जब जमनालाल बजाज ने इस शर्मनाक परिस्थिति का समाचार सुना तो उन्होंने चाहा कि दोनों में सुलह हो जाये। सीकर जमनालाल जी का जन्म स्थान था। उन्होंने हिंसा के बजाय लोगों को अहिंसक बने रहने की सलाह दी। 30 दिसम्बर, 1938 को जयपुर राज्य में फैले हुए अकाल का लेखा-जोखा करने तथा राहत कार्य करने के लिए जमनालालजी सवार्इ माधोपुर स्टेशन पर दूसरी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। इतने में इंस्पेक्‍टर जनरल ऑफ पुलिस एफ. एस. यंग ने उनको एक आदेश दिया, जिसमें यह लिखा हुआ था कि रियासत में उनके प्रवेश और गतिविधियों के कारण शांति भंग होने का खतरा है। इसलिए वे रियासत की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते। लेकिन इस निषेधाज्ञा ने प्रजा मंडल की आंखें खोल दीं। इसके कारण जमनालाल जी के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया। आखिर में जयपुर रियासत को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी। इसमें कोर्इ संदेह नहीं कि जमनालाल बजाज रियासतों में रहने वाली प्रजा के अधिकारों के सच्चे संरक्षक थे और वह अपने जीवन के अंत तक देशी राज्यों में नागरिक स्वतंत्रता के लिए अनथक संघर्ष करते रहे।

पदवी

1918 में सरकार ने जमनालाल बजाज को ‘राय बहादुर’ की पदवी से अलंकृत किया। इसके लिए जब जमनालाल बजाज ने गांधीजी से सलाह मांगी तो उन्होंने कहा- “नये सम्मान का सदुपयोग करो। सम्मान और पदवी इत्यादि खतरनाक चीजे हैं। उनका सदुपयोग की जगह दुरुपयोग अधिक हुआ है। मैं चाहूंगा कि तुम उसका सदुपयोग करो। यह तुम्हारी देशभक्ति या आध्यात्मिक उन्नति के आडे नहीं आयेगा।” 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ, तो जमनालाल जी ने अपनी  को पदवी लौटा दिया ।

मृत्यु

1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल से रिहार्इ के बाद जमनालाल जी महात्मा गाँधी की सहमति से आनंदमयी मां से मिलने और अपनी आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा को संतुष्ट करने का उपाय जानने की दृष्टि से देहरादून गये।  वहाँ से वर्धा लौटने के बाद मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण 11 फ़रवरी, 1942 में जमनालाल जी की अचानक मृत्यु हो गई ।

Leave a comment