काका हाथरसी की जीवनी – Kaka Hathrasi Biography Hindi

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काका हाथरसी भारत के प्रसिद्ध हिन्दी हास्य कवि थे। उन्हें हिन्दी हास्य व्यंग्य कविताओं का पर्याय माना जाता है। काका हाथरसी की शैली की छाप उनकी पीढ़ी के कई कवियों पर तो पड़ी ही थी, वर्तमान में भी कई लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। उनकी रचनाएँ समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर सबका ध्यान आकर्षित करती हैं। भले ही काका हाथरसी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी हास्य कविताए, जिन्हें वे ‘फुलझडियाँ’ कहा करते थे, सदैव हमे गुदगुदाती रहेंगी। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको काका हाथरसी की जीवनी – Kaka Hathrasi Biography Hindi के बारे में बताएगे।

काका हाथरसी की जीवनी – Kaka Hathrasi Biography Hindi

काका हाथरसी की जीवनी

जन्म

काका हाथरसी का जन्म 18 सितंबर, 1906 में उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले में हुआ था। उनका वास्तविक नाम प्र्भुलाल गर्ग था उनके पिता का नाम शिवलाल गर्ग और उनकी माता का नाम बरफ़ी देवी था। जब वे 15 दिन के थे, तभी प्लेग की महामारी के कारण उनके पिता की मृत्यु हो गई और परिवार के बुरे दिन शुरू हो गये। भयंकर ग़रीबी में भी काका ने अपना संघर्ष जारी रखते हुए छोटी-मोटी नौकरियों के साथ ही कविता रचना और संगीत शिक्षा का समंवय बनाये रखा

काका हाथरसी के प्रपितामह गोकुल, महावन से आकर हाथरस में बस गए थे और यहाँ उन्होंने बर्तन बेचने का काम (व्यापार) शुरू किया था। बर्तन के व्यापारी को उन दिनों ‘कसेरे’ कहा जाता था। पितामह (बाबा) श्री सीताराम कसेरे ने अपने पिता के व्यवसाय को नियमित रूप से चलायमान रखा। उसके बाद बँटवारा होने पर बर्तन की दुकान परिवार की दूसरी शाखा पर चली गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि काका जी के पिता को बर्तनों की एक दुकान पर मुनीमगीरी करनी पडी।

मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में काका की विवाह ‘रतन देवी’ से हो गई। काका की कविताओं में यही रतन देवी हमेशा ‘काकी’ बनी रहीं। लेकिन इन्हीं दिनों दुर्भाग्य ने फिर इनका साथ पकड़ लिया। विवाह के कुछ ही दिनों बाद फिर काका की नौकरी छूट गई और एक बार फिर से काका ने कई दिन काफ़ी मुफिलिसी में गुजारे।

प्लेग की बीमारी का कहर

काका का जन्म 1906 में ऐसे समय में हुआ था, जब प्लेग की भयंकर बीमारी ने हज़ारों घरों को उज़ाड़ दिया। यह बीमारी देश के जिस भाग में फैलती, उसके गाँवों और शहरों को वीरान बनाती चली जाती थी। शहर से गाँवों और गाँवों से नगरों की ओर व्याकुलता से भागती हुई भीड़ दिल को कांपने पर मजबूर कर देती थी। कितने ही घर उजड़ गए, बच्चे अनाथ हो गए, महिलाएँ विधवा हो गईं। किसी-किसी घर में तो नन्हें-मुन्नों को पालने वाला तक नहीं बचा था। तब काका केवल 15 दिन के ही थे, कि इनके पिताजी को प्लेग की बीमारी हो गयी। 20 वर्षीय माता बरफ़ी देवी, जिन्होंने अभी संसारी जीवन जानने-समझने का प्रयत्न ही किया था, इस वज्रपात से व्याकुल हो उठीं। मानों सारा विश्व उनके लिए सूना और अंधकारमय हो गया।

पड़ोसी वकील साहब पर कविता

उन दिनों घर में माताजी, बड़े भाई भजनलाल और एक बड़ी बहिन किरन देवी और काका कुल चार सदस्य रह गए थे। पिता की जल्दी मौत हो जाने के कारण वह अपने मामा के पास इगलास में जाकर रहने लगे। काका जी ने बचपन में चाट-पकौड़ी तक बेची। लेकिन कविता का शौक़ उन्हें बचपन से ही लग गया था। उन्होंने अपने मामा के पड़ोसी वकील साहब पर एक कविता लिखी-

एक पुलिंदा बांधकर कर दी उस पर सील
खोला तो निकले वहां लखमी चंद वकील
लखमी चंद वकील, वजन में इतने भारी
शक्ल देखकर पंचर हो जाती है लारी
होकर के मजबूर, ऊंट गाड़ी में जाएं
पहिए चूं-चूं करें, ऊंट को मिरगी आए

लेकिन किसी प्रकार यह कविता वकील साहब के हाथ पड़ गई और काका को पुरस्कार में पिटाई मिली।

‘काका’ नामकरण

वैसे तो काका हाथरसी का असली नाम तो ‘प्रभूलाल गर्ग’ था, लेकिन उन्हें बचपन में नाटक आदि में भी काम करने का शौक़ था। एक नाटक में उन्होंने ‘काका’ का किरदार निभाया, और बस तभी से प्रभूलाल गर्ग ‘काका’ नाम से प्रसिद्ध हो गए। चौदह साल की उम्र में काका फिर अपने परिवार सहित इगलास के हाथरस वापस आ गए। यहाँ पर उन्होंने एक जगह ‘मुनीम’ की नौकरी कर ली।

कविता का प्रकाशन

काका हाथरसी संगीत के प्रेमी तो थे ही, इसके साथ ही साथ उन्हें चित्रकारी का भी बहुत शौक़ था। उन्होंने कुछ दिनों तक व्यवसाय के रूप में चित्रशाला भी चलाई, लेकिन वह भी नहीं चली तो उसके बाद अपने एक साथी के सहयोग से संगीत कार्यालय की नींव रखी। इसी कार्यालय से संगीत पर ‘संगीत पत्रिका’ प्रकाशित हुई। उसका प्रकाशन आज भी अनवरत जारी है। काका की पहली कविता इलाहाबाद से छपने वाली पत्रिका ‘गुलदस्ता’ में छपी थी-

घुटा करती हैं मेरी हसरतें दिन रात सीने में
मेरा दिल घुटते-घुटते सख्त होकर सिल न बन जाए

इसके बाद काका की और भी कई कविताओं का लगातार प्रकाशन होता रहा।

सम्पादन

काका हाथरसी ने हास्य रस से ओत-प्रोत कविताओं के साथ-साथ संगीत पर भी पुस्तकें लिखी। उन्होंने संगीत पर एक मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। ‘काका के कारतूस’ और ‘काका की फुलझडियाँ’ जैसे स्तम्भों के द्वारा अपने पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए वे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के प्रति भी सचेत रहते थे। उनकी प्रथम प्रकाशित रचना 1933 में “गुलदस्ता” मासिक पत्रिका में उनके वास्तविक नाम से छपी थी।

 रचनाएँ

काका हाथरसी के मुख्य कविता संग्रह इस प्रकार हैं-

  • काका की फुलझड़ियाँ
  • काका के प्रहसन
  • लूटनीति मंथन करि
  • खिलखिलाहट
  • काका तरंग
  • जय बोलो बेईमान की
  • यार सप्तक
  • काका के व्यंग्य बाण
  • काका के चुटकुले

योगदान

जीवन के संघर्षों के बीच हास्य की फुलझड़ियाँ जलाने वाले काका हाथरसी ने 1932 में हाथरस में संगीत की उन्नति के लिये ‘गर्ग ऐंड कम्पनी‘ की स्थापना की थी, जिसका नाम बाद में ‘संगीत कार्यालय हाथरस’ पड़ा। भारतीय संगीत के सन्दर्भ में अनेक भाषा और लिपि में किये गये कार्यों को उन्होंने जतन से इकट्ठा करके प्रकाशित किया। उनकी लिखी पुस्तकें संगीत विद्यालयों में पाठ्य-पुस्तकों के रूप में प्रयुक्त की गई । 1935 से संगीत कार्यालय ने मासिक पत्रिका “संगीत” का प्रकाशन भी शुरू किया, जो कि अब तक लगातार चल रहा है।

पुरस्कार

काका हाथरसी का मंचीय कवियों में एक विशेष स्थान था। सैकड़ों कवि सम्मेलनों में काका जी ने काव्य पाठ किया और अपनी छाप छोडी है । काका को 1957 में लाल क़िला दिल्ली पर होने वाले कवि सम्मेलन का बुलावा आया तो उन्होंने अपनी शैली में काव्य पाठ किया और अपनी पहचान छोड़ दी। काका को कई पुरस्कार भी दिये गए ।

  • 1966 में बृजकला केंद्र के कार्यक्रम में काका को सम्मानित किया गया। काका हाथरसी को ‘कला रत्न’ ने नवाजा गया।
  • 1985 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने ‘पद्मश्री’ की उपाधि से नवाजा। काका कई बार विदेश में काव्य पाठ करने गए।
  • 1989 में काका को अमेरिका के वाल्टीमौर में ‘आनरेरी सिटीजन’ के सम्मान से सम्मानित किया गया।
  • दर्जनों सम्मान और उपाधियाँ काका को मिली।
  • काका ने फ़िल्म ‘जमुना किनारे’ में अभिनय भी किया।

काका हास्य को टॉनिक बताते थे। उनका कहना था कि-

डॉक्टर-वैद्य बतला रहे कुदरत का क़ानून
जितना हंसता आदमी, उतना बढ़ता खून
उतना बढ़ता खून, की जो हास्य में कंजूसी
सुंदर से चेहरे पर देखो छायी मनहूसी

काका के नाम पर पुरस्कारों की शुरुआत

काका हाथरसी नाम पर ही कवियों के लिये ‘काका हाथरसी पुरस्कार’ और संगीत के क्षेत्र में ‘काका हाथरसी संगीत’ सम्मान भी शुरू किये। काका हाथरसी ने अपने जीवन काल में हास्य रस को भरपूर जिया था। वे और हास्य रस आपस में इतने घुलमिल गए हैं कि हास्य रस कहते ही उनका चित्र सामने आ जाता है। उन्होंने कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों, रेडियो और टी. वी. के माध्यम से हास्य-कविता और साथ ही हिन्दी के प्रसार में याद करने योग्य योगदान दिया है। उन्होंने साधारण जनता के लिए सीधी और सरल भाषा में ऐसी रचनाएँ लिखीं, जिन्होंने देश और विदेश में बसे हुए करोड़ों हिन्दी के प्रेमियों के दिलों को छुआ।

मृत्यु

18 सितंबर, 1906 को जन्म लेने वाले काका हाथरसी की मृत्यु भी 18 सितंबर को ही 1995 में हुई ।