कृष्ण दास की जीवनी – Krishana Daas Biography Hindi

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कृष्णदास हिन्दी के भक्तिकाल के अष्टछाप के कवि थे। उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता, व्यवहार कुशलता और संघटन योयता से प्रभावित होकर वल्लभाचार्य ने उन्हें भेटिया (भेंट संग्रह करने वाला) के पद पर नियुक्त किया और फिर शीघ्र उन्हें श्रीनाथ जी के मंदिर का अधिकारी बना दिया। उन्होंने अपने इस उत्तरदायित्व का बड़ी योग्यता से निभाया। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको कृष्ण दास की जीवनी – Krishana Daas Biography Hindi के बारे में बताएंगे।

कृष्ण दास की जीवनी – Krishana Daas Biography Hindi

कृष्ण दास की जीवनी

 

जन्म

कृष्ण दास जन्म लगभग 1495 को गुजरात में चिलोतरा गाँव के एक कुनबी पाटिल परिवार में हुआ था। बचपन से ही प्रकृत्ति बड़ी सात्विक थी। जब वे 12-13 साल के थे, तो उन्होंने अपने पिता को चोरी करते देखा और उन्हें गिरफ्तार करा दिया परिणामस्वरूप वे पाटिल पद से हटा दिए गए। इस कारण पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया।

दीक्षा

कृष्ण दास भ्रमण करते हुए ब्रज पहुँचे। उन्हीं दिनों नवीन मंदिर में श्रीनाथ जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा करने की तैयारी हो रही थी। श्रीनाथ जी के दर्शन से वे बहुत प्रभावित हुए और वल्लभाचार्य से उनके संप्रदाय की दीक्षा ली।

उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता, व्यवहार कुशलता और संघटन योयता से प्रभावित होकर वल्लभाचार्य ने उन्हें भेंट संग्रह करने वाले के पद पर नियुक्त किया और फिर जल्द ही उन्हें श्रीनाथ जी के मंदिर का अधिकारी बना दिया। उन्होंने अपने इस उत्तरदायित्व का बड़ी योग्यता से निभाया। कृष्णदास को सांप्रदायिक सिद्धांतों का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण वे अपने संप्रदाय के अग्रगण्य लोगों में माने जाते थे।

चौरासी वैष्णवों की वार्ता

कृष्णदास जन्म से शूद्र होते हुए भी वल्लभाचार्य के कृपा-पात्र थे और मंदिर के प्रधान हो गए थे। ‘चौरासी वैष्णवों की वार्ता’ के अनुसार एक बार गोसाईं विट्ठलनाथजी से किसी बात पर अप्रसन्न होकर इन्होंने उनकी ड्योढ़ी (बरामदा ) बंद कर दी। इस पर गोसाईं के कृपापात्र महाराज बीरबल ने इन्हें कैद कर लिया।इसके बाद में गोसाईं जी इस बात से बड़े दुखी हुए और उनको कारागार से मुक्त कराके प्रधान के पद पर फिर ज्यों का त्यों प्रतिष्ठित कर दिया। कृष्ण दास ने भी और सब कृष्ण भक्तों के समान राधाकृष्ण के प्रेम को लेकर श्रृंगार रस के ही पद गाए हैं। ‘जुगलमान चरित’ नामक इनका एक छोटा सा ग्रंथ मिलता है। इसके अतिरिक्त इनके बनाए दो ग्रंथ और कहे जाते हैं- भ्रमरगीत और प्रेमतत्त्व निरूपण ।

पद

उन्होंने समय-समय पर कृष्ण लीला प्रसंगों पर पद रचना की जिनकी संख्या लगभग 250 है जो राग कल्पद्रुम, राग रत्नाकर तथा संप्रदाय के कीर्तन संग्रहों में उपलब्ध हैं।

रचनाएँ

इनका कविताकाल लगभग 1550 के आसपास माना जाता है ।

  • जुगलमान चरित
  • भ्रमरगीत
  • प्रेमतत्त्व निरूपण

मृत्यु

1575 और 1581ई. के बीच किसी समय उनका देहावासन हुआ।