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महाराजा गंगा सिंह की जीवनी – Maharaja Ganga Singh Biography Hindi

महाराजा गंगा सिंह 1888 से 1943 तक बीकानेर रियासत के महाराजा थे। उन्हें आधुनिक सुधारवादी भविष्यद्रष्टा के रूप में याद किया जाता है। पहले महायुद्ध के दौरान ‘ब्रिटिश इम्पीरियल वार केबिनेट’ के अकेले गैर-अँगरेज़ सदस्य थे। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको महाराजा गंगा सिंह की जीवनी – Maharaja Ganga Singh Biography Hindi के बारे में बताएगे ।

महाराजा गंगा सिंह की जीवनी – Maharaja Ganga Singh Biography Hindi

महाराजा गंगा सिंह की जीवनी

जन्म

महाराजा गंगा सिंह का जन्म 3 अक्तूबर, 1880 को बीकानेर में हुआ था। उनके पिता का नाम महाराजा लालसिंह था। गंगासिंह, बीकानेर के महाराजा लालसिंह की तीसरी संतान थे और डूंगर सिंह के छोटे भाई थे। जो बड़े भाई के देहांत के बाद 1887 में 13 दिसम्बर को बीकानेर-नरेश बने। उनका पहला विवाह प्रतापगढ़ राज्य की बेटी वल्लभ कुंवर से 1897 में, और दूसरा विवाह बीकमकोर की राजकन्या भटियानी जी से हुआ। जिनसे इनके दो पुत्रियाँ और चार पुत्र हुए।

शिक्षा

उनकी प्रारंभिक शिक्षा पहले घर ही में हुई और फिर  इसके बाद में अजमेर के मेयो कॉलेज में 1889 से 1894 के बीच हुई।

ठाकुर लालसिंह के मार्गदर्शन में 1894 से 1898 के बीच उन्हे प्रशासनिक प्रशिक्षण मिला।1898 में गंगा सिंह  को फ़ौजी-प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए देवली रेजिमेंट भेजा गया जो उस समय ले.कर्नल बैल के अधीन देश की सर्वोत्तम मिलिट्री प्रशिक्षण रेजिमेंट मानी जाती थी।

करियर

पहले विश्वयुद्ध में एक फ़ौजी अफसर के बतौर गंगासिंह ने अंग्रेजों की तरफ से ‘बीकानेर कैमल कार्प्स’ के प्रधान के रूप में फिलिस्तीन, मिश्र और फ़्रांस के युद्धों में सक्रिय भूमिका निभायी। 1902 में वे प्रिंस ऑफ़ वेल्स के और 1910 में किंग जॉर्ज पंचम के ए. डी. सी. भी रहे।

महायुद्ध समाप्त होने के बाद अपनी पुश्तैनी बीकानेर रियासत में लौट कर उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और विकास की गंगा बहाने के लिए जो काम किये वे किसी भी लिहाज़ से साधारण नहीं कहे जा सकते। 1913 में उन्होंने एक चुनी हुई जन-प्रतिनिधि सभा का गठन किया, 1922 में एक मुख्य न्यायाधीश के अधीन अन्य दो न्यायाधीशों का एक उच्च-न्यायालय स्थापित किया और बीकानेर को न्यायिक-सेवा के क्षेत्र में अपनी ऐसी पहल से देश की पहली रियासत बनाया। अपनी सरकार के कर्मचारियों के लिए उन्होंने ‘एंडोमेंट एश्योरेंस स्कीम’ और जीवन-बीमा योजना लागू की, निजी बेंकों की सेवाएं आम नागरिकों को भी मुहैय्या करवाईं, और पूरे राज्य में बाल-विवाह रोकने के लिए शारदा एक्ट कड़ाई से लागू किया। 1927 में वे ‘सेन्ट्रल रिक्रूटिंग बोर्ड ऑफ़ इण्डिया’ के सदस्य नामांकित हुए और उसी वर्ष उन्होंने ‘इम्पीरियल वार कांफ्रेंस’ में, 1929 में ‘पेरिस शांति सम्मलेन’ में और ‘इम्पीरियल वार केबिनेट’ में भारत का प्रतिनिधित्व किया।1920 से 1926 के बीच गंगा सिंह ‘इन्डियन चेंबर ऑफ़ प्रिन्सेज़’ के चांसलर बनाये गए। इस बीच 1924 में ‘लीग ऑफ़ नेशंस’ के पांचवें अधिवेशन में भी इन्होंने भारतीय प्रतिनिधि की हैसियत से भाग लिया।

ये ‘श्री भारत-धर्म महामंडल’ और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संरक्षक, ‘रॉयल कोलोनियल इंस्टीट्यूट’ और ‘ईस्ट इण्डिया एसोसियेशन’ के उपाध्यक्ष, ‘इन्डियन आर्मी टेम्परेन्स एसोसियेशन’ ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ लन्दन की ‘इन्डियन सोसाइटी’ ‘इन्डियन जिमखाना’ मेयो कॉलेज, अजमेर की जनरल कांसिल, ‘इन्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट’ जैसी संस्थाओं के सदस्य और, ‘इन्डियन रेड-क्रॉस के पहले सदस्य थे।

योगदान

उन्होंने1899-1900 के बीच पड़े कुख्यात ‘छप्पनिया काल’ की ह्रदय-विदारक विभीषिका देखी थी, और अपनी रियासत के लिए पानी का इंतजाम एक स्थाई समाधान के रूप में करने का संकल्प लिया था और इसीलिये सबसे क्रांतिकारी और दूरदृष्टिवान काम, जो उनके द्वारा अपने राज्य के लिए किया गया वह था- पंजाब की सतलुज नदी का पानी ‘गंग-केनाल’ के ज़रिये बीकानेर जैसे सूखे प्रदेश तक लाना और नहरी सिंचित-क्षेत्र में किसानों को खेती करने और बसने के लिए मुफ्त ज़मीनें देना।

श्रीगंगानगर शहर के विकास को भी उन्होंने प्राथमिकता दी वहां कई निर्माण करवाए और बीकानेर में अपने निवास के लिए पिता लालसिंह के नाम से ‘लालगढ़ पैलेस’ भी बनवाया। बीकानेर को जोधपुर शहर से जोड़ते हुए रेलवे के विकास और बिजली लाने की दिशा में भी वे बहुत सक्रिय रहे। जेल और भूमि-सुधारों की दिशा में उन्होंने नए कायदे कानून लागू करवाए, नगरपालिकाओं के स्वायत्त शासन सम्बन्धी चुनावों की प्रक्रिया शुरू की, और राजसी सलाह-मशविरे के लिए एक मंत्रिमंडल का गठन भी किया। 1933 में लोक देवता रामदेवजी की समाधि पर एक पक्के मंदिर के निर्माण का श्रेय भी उन्ही को जाता है।

पुरस्कार

  •  1880 से 1943 तक उन्हें 14 से भी ज्यादा कई महत्वपूर्ण सैन्य-सम्मानों के अलावा 1900  में ‘केसरेहिंद’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।
  • 1918 में उन्हें पहली बार 19 तोपों की सलामी दी गयी,
  • वहीं 1921 में दो साल बाद उन्हें अंग्रेज़ी शासन द्वारा स्थाई तौर पर 19 तोपों की सलामी योग्य शासक माना गया था ।

मृत्यु

2 फरवरी 1943  को बंबई में  महाराजा गंगा सिंह की मृत्यु हो गई ।

Sonu Siwach

नमस्कार दोस्तों, मैं Sonu Siwach, Jivani Hindi की Biography और History Writer हूँ. Education की बात करूँ तो मैं एक Graduate हूँ. मुझे History content में बहुत दिलचस्पी है और सभी पुराने content जो Biography और History से जुड़े हो मैं आपके साथ शेयर करती रहूंगी.

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