मेजर सोमनाथ शर्मा की जीवनी – Major Somnath Sharma Biography Hindi

October 28, 2019
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मेजर सोमनाथ शर्मा 1942 में सेना कुमाऊँ रेजीमेंट चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमांडर थे। उन्होंने अक्टूबर-नवम्बर, 1947 के भारत-पाक संघर्ष में अपनी वीरता से शत्रु के छक्के छुड़ा दिये। उनके महान बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें प्रथम परमवीर चक्र की उपाधि से सुशोभित किया था। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको सोमनाथ शर्मा की जीवनी – Major Somnath Sharma Biography Hindi के बारे में बताएंगे।

सोमनाथ शर्मा की जीवनी – Major Somnath Sharma Biography Hindi

जन्म

मेजर सोमनाथ का जन्म 31 जनवरी 1923 को जम्मू में हुआ था। उनके पिता का नाम अमरनाथ शर्मा था और वे सेना में डॉक्टर थे और आर्मी मेडिकल सर्विस के डायरेक्टर जनरल के पद से सेवामुक्त हुए थे। मेजर सोमनाथ का कीर्तिमान एक गौरव की बात भले ही हो लेकिन उसे आश्चर्यजनक इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि उनके परिवार में फौजी संस्कृति एक परम्परा के रूप में चलती रही थी। इनके पिता यदि चाहते तो एक डॉक्टर के रूप में लाहौर में अपनी प्रैक्टिस जमा सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी इच्छा से भारतीय सेनिकों की सेवा को ही चुना।  उनके पिता के अलावा मेजर सोमनाथ पर अपने मामा से भी काफी प्रभावित हुए थे। उनके मामा लैफ्टिनेंट किशनदत्त वासुदेव 4/19 हैदराबादी बटालियन में थे और वे 1942 में मलाया में जापानियों से लड़ते शहीद हो गए थे।

शिक्षा

मेजर सोमनाथ की शुरुआत की स्कूली शिक्षा अलग-अलग जगह होती रही, जहाँ उनके पिता की पोस्टिंग होती थी। मेजर सोमनाथ बचपन से ही खेल कूद और एथलेटिक्स में रुचि रखते थे।मेजर सोमनाथ ने शेरवुड कॉलेज नैनीताल और प्रिंस ऑफ वेल्स रेल अकादमी देहरादून से अपने शिक्षा प्राप्त की थी

करियर

मेजर सोमनाथ ने अपने सैनिक करियर की शुरुआत 22 फरवरी, 1942 से की जब उन्होने चौथी कुमायूं रेजिमेंट में बतौर कमीशंड ऑफिसर प्रवेश लिया। उनका फौजी कार्यकाल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ और वे मलाया के पास के रण में भेज दिये गये। पहले ही दौर में उन्होंने अपने पराक्रम के तेवर दिखाए और वे इसके बाद एक विशिष्ट सैनिक के रूप में पहचाने जाने लगे। 1942 में सेना में रहते हुए कुमाऊं रेजिमेंट से उन्हें कमीशन प्राप्त हुआ था।

3 नवम्बर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा की एक टुकड़ी को कश्मीर घाटी के बदगाम मोर्चे पर जाने का आदेश दिया गया। 3 नवम्बर को प्रकाश की पहली किरण निकलने से पहले मेजर सोमनाथ बदगाम पहुँच गए और उत्तरी दिशा में उन्होंने दिन के 11 बजे तक अपनी टुकड़ी तैनात कर दी। तभी दुश्मन की लगभग 500 लोगों की सेना ने उनकी टुकड़ी को तीनों तरफ से घेर लिया और उन पर हमला किया और  इसके बाद भारी गोला बारी से सोमनाथ के सैनिक हताहत होने लगे। अपनी दक्षता का परिचय देते हुए सोमनाथ ने अपने सैनिकों के साथ गोलियां बरसाते हुए दुश्मन को बढ़ने से रोके रखा।  लेकिन इस दौरान उन्होंने खुद को दुश्मन की गोली बारी के बीच बराबर खतरे में डाला और कपड़े की पट्टियों की मदद से हवाई जहाज को ठीक लक्ष्य की ओर पहुँचने में मदद की।

उपाधि

उनके महान बलिदान के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें प्रथम परमवीर चक्र की उपाधि उनके मरणोंपरांत दी गई थी।

बलिदान

3 नवंबर 1947 बदगाम, कश्मीर के काबलियों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

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