पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जीवनी – Padumlal Punnalal Bakshi Biography Hindi

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पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सरस्वती के कुशल संपादक, साहित्य वाचस्पति और मास्टर जी के नाम से प्रसिद्ध हैं। वह एक प्रसिद्ध निबंधकार थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा खैरगढ़ में हुई है। इसके पश्चात उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक पास किया और खैरागढ़ में अध्यापक के रूप में कार्य किया । उन्हे देश की सबसे सम्माननीय पत्रिका सरस्वती का संपादक बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। गुरु रविंद्रनाथ टैगोर से प्रभावित बख्शीजी ने साहित्य की सभी विधाओं में लिखा। उन्हे डि. लीट. और विधा वाचस्पति जैसी उत्तम उपाधियों दी गई है। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जीवनी – Padumlal Punnalal Bakshi Biography Hindi के बारे में बताएंगे.

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जीवनी – Padumlal Punnalal Bakshi Biography Hindi

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जीवनी

जन्म

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई, 1894, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़, भारत में हुआ था। इनके पिता श्री पुन्नालाल बख्शी था और वे ‘खेरागढ़’ के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी चंद्रकांता संतति उपन्यास के प्रति विशेष आसक्ति के कारण स्कूल से भाग खड़े हुए और हेडमास्टर पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा जमकर बेतों से पीटे गये। 14वीं शताब्दी में बख्शी जी के पूर्वज श्री लक्ष्मी निधि राजा के साथ मण्डला से खैरागढ़ में आये थे और तब से यहीं पर आकर बस गये। बख्शी के पूर्वज फतेह सिंह और उनके पुत्र श्रीमान राजा उमराव सिंह दोनों के शासनकाल में श्री उमराव बख्शी राजकवि थे। 1913 में लक्ष्मी देवी के साथ उनका विवाह हो गया।

शिक्षा

पदुमलाल बख्शी की प्राइमरी की शिक्षा खैरागढ़ में ही हुई। 1911 में यह मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में बैठे। हेडमास्टर एन.ए. ग़ुलामअली के निर्देशन पर उनके नाम के साथ उनके पिता का नाम पुन्नालाल लिखा गया। तब से वे अपना पूरा नाम पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखने लगे। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में वे पास नहीं हो पाये। उसी वर्ष 1911 में उन्होंने साहित्य जगत में प्रवेश किया। 1912 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की। उच्च शिक्षा के लिए इन्होंने बनारस के सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में प्रवेश किया। 1916 में ही इनकी नियुक्ति स्टेट हाई स्कूल राजनाँदगाँव में संस्कृत अध्यापक के पद पर हुई। 1916 में उन्होंने बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी बी. ए. तक शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ साहित्य सेवा के क्षेत्र में आये और सरस्वती में लिखना शुरू किया। उनका नाम द्विवेदी युग के प्रमुख साहित्यकारों में लिया जाता है।

करियर

1911 में जबलपुर से निकलने वाली ‘हितकारिणी’ में बख्शी की पहली कहानी ‘तारिणी’ प्रकाशित हुई थी। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी ने राजनांदगाँव के स्टेट हाई स्कूल में सबसे पहले 1916 से 1919 तक संस्कृत शिक्षक के रूप में कार्य किया। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने अपने साहित्यिक जीवन कि शुरुआत कवि के रूप में की थी। 1916 से लेकर लगभग 1925 ई. तक उनकी स्वच्छन्दतावादी प्रकृति की फुटकर कविताएँ उस समय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। इसके बाद में ‘शतदल’ नाम से इनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को वास्तविक ख्याति आलोचक तथा निबन्धकार के रूप में मिली।

संपादक

1920 में वे सरस्वती के सहायक संपादक के रूप में नियुक्त किये गये और एक साल के भीतर ही 1921 में वे सरस्वती के प्रधान संपादक बनाये गये वहाँ  पर वे अपने इच्छा से त्यागपत्र देने तक1925 उस पद पर बने रहे। 1929 से 1949 तक खैरागढ़ विक्टोरिया हाई स्कूल में अंगेज़ी शिक्षक के रूप में नियुक्त हुई । कांकेर में भी कुछ समय तक उन्होंने शिक्षक के रूप में काम किया। तब ‘सरस्‍वती’ हिन्दी की केवल एक ऐसी पत्रिका थी जो हिन्‍दी साहित्‍य की आमुख पत्रिका थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संपादन में शुरू में इस पत्रिका के संबंध में सभी विज्ञ पाठक जानते हैं। 1920 में द्विवेदी जी ने पदुमलाल पन्‍नालाल बख्‍शी की संपादन क्षमता को नया आयाम देते हुए इन्‍हें ‘सरस्‍वती’ का सह संपादक नियुक्‍त किया। इसके बाद में 1921 में वे ‘सरस्‍वती’ के प्रधान संपादक बने, यह वो समय था जब विषम परिस्थितियों में भी उन्‍होंने हिन्‍दी के स्‍तरीय साहित्‍य को संकलित कर ‘सरस्‍वती’ का प्रकाशन शुरू रखा

लेखन कार्य

उन्होंने 1929 से 1934 तक कई पाठ्यपुस्तकों यथा- पंचपात्र, विश्वसाहित्य, प्रदीप की रचना की और वे प्रकाशित हुईं। 1949 से 1957 के दरमियान महत्वपूर्ण संग्रह- कुछ और कुछ, यात्री, हिंदी कथा साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, बिखरे पन्ने, तुम्हारे लिए, कथानक आदि प्रकाशित हो चुके थे। 1968 का वर्ष उनके लिए अत्य़न्त महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसी बीच उनकी प्रमुख और प्रसिद्ध निबंध संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें हम- मेरी अपनी कथा, मेरा देश, मेरे प्रिय निबंध, वे दिन, समस्या और समाधान, नवरात्र, जिन्हें नहीं भूलूंगा, हिंदी साहित्य एक ऐतिहासिक समीक्षा, अंतिम अध्याय को गिना सकते हैं।

प्रमुख कृतियाँ

बख्शी जी की रचनात्मकता का दायरा विशाल था। उन्होंने कई विधाओं में अनेक पुस्तकों की रचनाएँ तो की हीइसके साथ ही प्रकाशित पुस्तकों के अतिरिक्त भी उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं की एक बड़ी संख्या रही हैं। इन रचनाओं में कहानियाँ, एकांकी, अनूदित साहित्य, बाल साहित्य और विभिन्न शैलियों में लिखे गये निबंधों की एक बड़ी संख्या शामिल हैं। बख्शी जी के ढेर सारे समीक्षात्मक निबंध भी रोचक कथात्मक शैली में लिखे गये हैं। बख्शी जी ने मौलिक रचनाओं के अतिरिक्त देश-विदेश के कई लेखकों की रचनाओं का सारानुवाद भी किया था। इनमें हरिसाधन मुखोपाध्याय, चार्ल्स डिकेंस, बालजाक, अलेक्जेंडर ड्यूमा, गोर्की और टॉमस हार्डी की रचनाएँ भी शामिल हैं। ये सभी रचनाएँ उनकी ग्रन्थावली में सुसंबद्ध रूप में संकलित हुई हैं।

कविताएँ

  • अश्रुदल
  • शतदल
  • पंच-पात्र

नाटक

  •  मौरिस मैटरलिंक के नाटक ‘सिस्टर वीट्रिस’ का मर्मानुवाद-अन्नपूर्णा का मंदिर
  • मौरिस मैटरलिंक के नाटक ‘दी यूज़लेस डेलिवरेन्स’ का छायानुवाद-उन्मुक्ति का बंधन

उपन्यास

  • कथा-चक्र
  • भोला (बाल उपन्यास)
  • वे दिन (बाल उपन्यास)

समालोचना-निबन्ध

  • हिन्दी साहित्य विमर्श
  • विश्व-साहित्य
  • हिन्दी कहानी साहित्य
  • हिन्दी उपन्यास साहित्य
  • प्रदीप (प्राचीन तथा अर्वाचीन कविताओं का आलोचनात्मक अध्ययन)
  • समस्या
  • समस्या और समाधान
  • पंचपात्र
  • पंचरात्र
  • नवरात्र
  • यदि मैं लिखता (कुछ प्रसिद्ध कृतियों पर कथात्मक विचार)
  • हिन्दी-साहित्य : एक ऐतिहासिक समीक्षा

साहित्यिक-सांस्कृतिक निबंध

  • बिखरे पन्ने
  • मेरा देश

आत्मकथा-संस्मरण

  • मेरी अपनी कथा
  • जिन्हें नहीं भूलूंगा

साहित्य-समग्र

  • बख्शी ग्रन्थावली आठ खण्डों में – पहला संस्करण-2007 में संपादक- डॉ० नलिनी श्रीवास्तव, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित किया गया है।

पुरस्कार

  • हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा 1949 में साहित्य वाचस्पति की उपाधि से अलंकृत किया गया।
  • 1950 में वे मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति निर्वाचित हुए।
  • 1951 में डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी की अध्यक्षता में जबलपुर में मास्टर जी का सार्वजनिक अभिनंदन किया गया।
  • 1969 में सागर विश्वविद्यालय से द्वारिका प्रसाद मिश्र (मुख्यमंत्री) द्वारा डी-लिट् की उपाधि से विभूषित किया गया।

मृत्यु

दिसंबर 1971 को  रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की मृत्यु हो गई.