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सूरजमल की जीवनी -Surajmal Biography Hindi

Surajmal को उनके पिता महाराजा बदनसिंह की मृत्यु के बाद 1756 में भरतपुर राज्य का शासक बनाया गया । राजनैतिक कुशलता और कुशाग्र बुद्धि के कारण उन्हे ‘जाट’ जाति का प्लेटों भी कहा जाता है। उनके राज्य में आगरा, मेरठ, मथुरा, अलीगढ़ आदि सम्मिलित थे। तो आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको सूरजमल की जीवनी -Surajmal Biography Hindi के बारे में बताएगे।

सूरजमल की जीवनी -Surajmal Biography Hindi

जन्म

Surajmal का जन्म 13 फरवरी, 1707 को हुआ था। उनके पिता का नाम महाराजा बदनसिंह था। उनके बेटे का नाम जवाहरसिंह था।

सूरजमल दूसरे राज्यों की तुलना में हिन्दुस्तान के सबसे शक्तिशाली शासक में से एक थे । उनकी सेना में 1500 घुड़सवार और 25 हजार पैदल सैनिक थे। उन्होंने अपने पीछे 10 करोड़ का सैनिक खजाना छोड़ा। मराठा नेता होलकर ने 1754 में कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा सूरजमल ने नजीबुद्दोला द्वारा अहमद शाह अब्दाली के समर्थन से भारत को मजहबी राष्ट्र बनाने को कोशिश को भी विफल कर दिया।

सूरजमल ने अफगान सरदार असंद खान, मीर बख्शी, सलावत खां आदि को पराजित किया। 1757 में अहमद शाह अब्दाली दिल्ली पहुच गया और उनकी सेना ने ब्रज के तीर्थ को नष्ट करने के लिए आक्रमण किया। उसको बचाने के लिए सिर्फ महाराजा सूरजमल ही आगे आये और उनके सैनिको ने बलिदान दिया। इसके बाद में अब्दाली वापस लौट गया।

जब सदाशिव राव भाऊ अहमद शाह अब्दाली को पराजित करने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा था, तभी खुद पेशवा बालाजी बाजीराव ने भाऊ को सुझाव दिया कि उत्तर भारत में मुख शक्ति के रूप में उभर रहे महाराजा सूरजमल का सम्मान कर उनके सुझाव पर ध्यान दिया जाए। परंतु भाऊ ने युद्ध सम्बन्धी इस सुझाव पर कोई ध्यान नही दिया और अब्दाली के हाथों पराजित हो गए ।

इस युद्ध में मराठों को भारी क्षति हुई । युद्ध के बाद लगभग 50 हजार मराठा परिवार महाराजा सूरजमल के राज्य में पहुचे। जिसके बाद में अब्दाली ने सूरजमल को चेतावनी देते हुआ शरण में आए मराठों को सौपने के लिए कहा , लेकिन महाराजा सूरजमल ने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया और मराठा सरदारों को सौपने से इंकार कर दिया। विद्वानों ने तत्कालीन शासकों ने महाराजा सूरजमल के इस कार्य की काफी प्रशंसा की थी ।

राजा सूरजमल के समय जाट राज्य अपने उन्नति के शिखर पर था। मुग़ल राज्य के मध्य में उन्होंने भरतपुर का शक्तिशाली राज्य स्थापित किया। भरतपुर राज्य इतना शक्तिशाली हो गया था कि मुग़ल और अन्य राजनैतिक शक्तियाँ उसकी मदद मांगने को उत्सुक रहती थी।

महाराजा सूरजमल भरतपुर के जाने-माने शासक थे। उसके पिता बदनसिंह ने डीग को बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। सूरजमल ने भरतपुर शहर की स्थापना की। सूरजमल से पूर्व जाट नेता गोकुल औरंगजेब की मंदिर-मूर्ति विनाश नीति का प्रबल विरोधी थे।

मथुरा और आगरा के जाट काफी समय तक मुगलों के अत्याचार तथा कुशासन का शिकार रहे। गोकुल राजाराम ने मुगलों के अत्याचार का प्रबल विरोध किया और सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे से बहुमूल्य रत्नों और सोने चांदी के पत्थरों को उखाड़ दिया। राजाराम के बाद चूडामन ने आजीवन तक मुगलों के साथ संघर्ष किया।

जयपुर के महाराजा जयसिंह की मृत्यु के बाद हुए उत्तराधिकार युद्ध में सूरजमल के सहयोग से ईश्वरी सिंह विजयी हुए और जयपुर की गद्दी पर बैठे। मई 1753 ई. सूरजमल ने फिरोजशाह कोटला पर कब्जा कर लिया। मराठों ने जनवरी 1754 से मई 1754  तक भरतपुर के कुम्हेर के किले को घेरे रखा पर वे इस किले को नही जीत पाएं और उन्हें उनके साथ संधि करनी पड़ी।

1761 ई में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के हाथों हार के बाद महाराजा सूरजमल ने शेष बचें मराठा सैनिकों के खाने पीने, इलाज और कपड़ों की व्यवस्था की थी । सूरजमल ने अपने प्रभुत्व वाले क्षेत्रों में किले और महल बनवाएं, जिनमें प्रसिद्ध लोहागढ़ किला भी सम्मलित हैं। मराठों के पतन के बाद सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक, झज्जर, आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, बनारस, फरुखनगर इत्यादि इलाके जीत लिए,

मृत्यु

25 दिसम्बर 1763 ई. को महाराजा सूरजमल की मुगलों ने धोखे से हत्या कर दी थी, इसके एक साल बाद जवाहरसिंह ने बदला लेकर लाल किले पर फतह हासिल की थी।

कविताएँ

सूरजमल पर तीन कविताएं भी लिखी गई है वे इस प्रकार है-

उनकी पहली कविता के रचनाकार रचनाकार रामलाल जाणी जी है।

13 फरवरी 1707 बदन सिंह घर जन्म पाया।
सन 1733 सूरजमल ने गढ भरतपुर बसाया।।

वीरता धीरता चातुर्य से सबको लोहा मनवाया ।
अजय योद्धा का परचम विश्व भर में लहराया।।

वो जाट वीर था सदा सर्वधर्म हितकारी ।
हिन्दू मुस्लिम सब प्रजा थी उनको प्यारी ।।

25 वर्ष की उम्र में सोघर जीत आया।
अजेय दुर्ग लोहागढ़ का निर्माण करवाया।।

अब आ गई बागडोर सूरजमल के हाथ।
भरतपुर का हर वासी हो गया सनाथ।।

घनघोर संकट भी डिगा नहीं पाए वीर को ।
सूझबूझ से बदल दिया राज्य की तकदीर को ।।

सन 1748 का ऐतिहासिक था बागडू रण ।
काम लिया सूरजमल ने बुद्धि चातुर्य क्षण-क्षण ।।

बागड़ू का वह युद्ध बेमेल था सामने थी सेना भारी।
लेकिन बुद्धि का खेल था,सू रजमल ने बाजी मारी ।।

एक तरफ थे बड़े-बड़े मराठा राजपूत योद्धा।
दूसरी तरफ सूरजमल अकेले ने सब को रौंदा।।

सूरजमल के रण कौशल से हारी बाजी पलट गई.
जाट शेरों से डर के मारे शत्रु सेना पीछे हट गई ।।

ईश्वर सिंह को मिली राजगद्दी और सूरजमल को नाम ।
जाट सेना ने दुश्मन का कर दिया काम तमाम।।

सन 1750 मीर बख्शी को चारों ओर से घेरा ।
दुश्मन के आजू-बाजू में था सूरजमल का डेरा।।

मीर बख्शी मांग रहा था संधि की भीख ।
सब कह रहे थे सूरजमल से ले तू सीख ।।

रुहेलो के विरुद्ध जाटों ने वीरता दिखलाई.
सूरजमल ने बल्लभगढ़ की समस्या सुलझाई ।।

मुगल बादशाह की सेना बड़ी लाचार थी।
वीर सूरजमल की सेना तेजस्वी और खूंखार थी।।

मुगल मराठा संयुक्त सेना आ धमकी थी ।
लेकिन वीर सूरजमल की बुद्धि फिर चमकी थी।।

बुद्धि चातुर्य का उपयोग भरपूर किया ।
दुश्मन को संधि करने को मजबूर किया ।।

मुगल मराठा विशाल सेना काम ना आई.
जाटों ने बुद्धि बल से उन को धूल चटाई.।

भोगी अहमदशाह अब्दाली का जी ललचाया।
उसने आकर दिल्ली में आतंक मचाया ।।

जाट राज्य को लूटने का ख्याल आया।
उसने सूरजमल को कर देने का संदेश भिजवाया ।।

जवाहर सिंह ने अफगान टुकड़ी को हराया ।
अब अब्दाली ने लूटपाट का हुक्म फरमाया ।।

मथुरा में चहुंओर तोपों का धुआं छाया।
अब्दाली सूरजमल के किलों को जीत नहीं पाया ।।

न भेद न कोई जीत का मौका आया ।
उसने हार कर कंधार का मार्ग अपनाया।।

पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 में थी छाई ।
राजपूत देख रहे थे तटस्थ चुपचाप लड़ाई ।।

उनकी विलासिता और दूरदर्शिता आड़े आई ।
वीर सूरजमल ने फिर तलवार चमकाई.।

जाटों की बहादुरी थी दुनिया में छाई ।
शत्रु सेना जाटों की बहादुरी से घबराई ।।

सूरजमल वीर था बड़ा बुद्धिमानी ।
उसने सदा प्रजा की रक्षा की ठानी ।।

सभी धर्म पंथ थे उसके लिए समान।।
नहीं उसने किया किसी का अपमान।।

हर कोई सूरजमल की शरण आया ।
किसी को चौखट से वापस नहीं लौटाया।।

61 में जाटों ने फिर आगरा को जय किया।
वीर गोकुला की शहीदी का बदला लिया ।।

उस जाट वीर सूरजमल ने हर युद्ध जीता था ।
उसके बिना खुद इतिहास का खजाना रीता था ।।

सन 1763 में वह वीर स्वर्ग सिधारा था।
हर इतिहासकार ने उसको पुकारा था ।।

उसका इतिहास विश्व पटल पर छाया था ।
हर कोई उसकी गाथा लिखने को ललचाया था ।।

किसी ने लिखी कविताएं किसी ने गीत।
हजारों संदेश देती है उसकी एक एक जीत ।।

उनकी वीरता कभी शब्दों में सिमट नहीं पाएगी ।
मैंने एक कविता लिखी दुनिया लिखी लिखती जाएगी।।

वीर सूरजमल हिंदुस्तान का आखिरी सम्राट था।
वह शूरवीर बुद्धिमान तेजस्वी जाट था।।

उनकी दूसरी और तीसरी कविता के लेखक बलवीर घिंटाला तेजाभक्त जी है

बच रही थी जागीरें जब, बहु बेटियों के डोलों से,

तब एक सूरज निकला, ब्रज भौम के शोलों से,

दिन नही मालूम मगर, थी फरवरी सत्रह सो सात,

जब पराक्रमी बदन के घर, पैदा हुआ बाहुबली जाट,

था विध्वंश था प्रलय, वो था जिता जागता प्रचंड तूफां,

तुर्कों के बनाये साम्राज्य का, मिटा दिया नामो निशां,

खेमकरण की गढी पर, बना कर लोहागढ ऊंचा नाम किया,

सुजान नहर लाके उसने, कृषकों को जीवनदान दिया,

बात है सन् 1748 की, जब मचा बगरू में हाहाकार,

7 रजपूती सेनाओ का, अकेला सूरज कर गया नरसंहार,

इस युद्ध ने इतिहास को, उत्तर भारत का नव यौद्धा दिया,

मुगल मराठों का कलेजा, अकेले सूरज ने हिला दिया,

मराठा मुगल रजपूतो ने, मिलकर एक मौर्चा बनाया,

मगर छोटी गढी कुम्हेर तक को, यह मौर्चा जीत न पाया,

घमंड में भाऊ कह गया, नहीं चाहिए जाटों की ताकत,

मराठों की दुर्दशा बता रहा, तृतीय समर ये पानीपत,

अब्दाली के सेना ने जब, मराठों की औकात बताई,

रानी किशोरी ने ही तब, शरण में लेके इनकी जान बचाई,

दंभ था लाल किले को खुद पे, कहलाता आगरे का गौरव था,

सूरज ने उसकी नींव हीला दी, जाटों की ताकत का वैभव था,

बलशाली था हलधर अवतारी था, था जाटों का अफलातून,

जाट प्लेटो गजमुखी वह, फौलादी जिस्म गर्वीला खून,

हारा नहीं कभी रण में, ना कभी धोके से वार किया,

दुश्मन की हर चालों को, हंसते हंसते ही बिगाड़ दिया,

ना केवल बलशाली था, बल्कि विधा का ज्ञानी था,

गर्व था जाटवंश के होने का, न घमंडी न अभिमानी था,

25 दिसंबर 1763 में, नजीबद्दीन से रणसमर हुआ,

सहोदरा की माटी में तब, इसका रक्त विलय हुआ,

56 वसंत की आयु में भी, वह शेरों से खुला भिड़ जाता था,

जंगी मैदानों में तलवारों से, वैरी मस्तक उड़ा जाता था,

वीरों की सदा यह पहचान रही है, रणसमर में देते बलिदान है,

इस सूरज ने वही इतिहास रचा, शत शत तुम्हें प्रणाम है,

अमर हो गया जाटों का सूरज, दे गया गौरवगान हमें,

कर गया इतिहास उज्ज्वल, दे गया इक अभिमान हमें,

‘तेजाभक्त बलवीर’ तुम्हें वंदन करे, करे नमन चरणों में तेरे,

सदा वैभवशाली तेरा शौर्य रहे, सदा विराजो ह्रदय में मेरे

तीसरी कविता

जंजीर गुलामी की जकडी, विषबेल चतुर्दिश फैली थी। अफगानों की करतूतो से, हिंद की सुचिता मैली थी।।

तब एक एक राजाओं ने, संधियां करना शुरू किया। लोहागढ पर दुख के अंबुद ने, घनघोर उमड़ना शुरू किया।।

जिस लोहागढ को सींचा था, गोकुल, चूड़ा के रक्तउबालों ने। जिस लोहागढ को पाला था, बदनसिंह जैसे मतवालों ने।।

जिस लोहागढ की चिंगारी ने, त्रिसेना को धूल चटाई थी। वो साधारण सा मनुज नहीं, सुरज की ज्वाला जमीं-उतर आई थी।।

हय पर सवार मर्दाने ने, कर में कृपाण को साध लिया। भीषण निनाद गरज उठा, निज सहादरा को गुंजाय दिया।।

वो थका नहीं वो रुका नहीं, अरिमर्दन करता जाता था । अरु काट काट अफगानों को , हुंकारे भरता जाता था।।

वो नव तुरंग पर चढ़ा बढ़ा, यों लड़ा कि ज्यों भीषण ज्वाला। पर रोक पाया ना पीठ वार, जो वैरी ने था कर डाला।।

तब घायल हुआ सिंह पर, धोखे से अरि ने वार किया। मिल गई वीरगति सूरज को, माटी का कर्ज उतार दिया।।

सूरज तो चला गया लेकिन, इक प्रश्न बाद में जिंदा था। सकल नरेशों के कुकृत्यों पर, ये हिंद सकल शर्मिंदा था।।

उस समय अगर कुछ रजवाड़े, सूरज का साथ निभा जाते। पानीपत में ही हम सब, दिल्ली को दुल्हन बना लाते।।

अफगानों पर मिलती विजय मगर, कुछ अपनों से ही हारा गया। कुछ गिदड़ वंशों की गद्दारी , अपने सूरज को अस्ता गया।।

हे सूरज! हैं नाज हमें, नाज हमें हिंद के उस बाहुबल पर। ‘तेजाभक्त’ का स्वीकारो वंदन, हैं नाज हमें गढ लोहाचंल पर।।

Sonu Siwach

नमस्कार दोस्तों, मैं Sonu Siwach, Jivani Hindi की Biography और History Writer हूँ. Education की बात करूँ तो मैं एक Graduate हूँ. मुझे History content में बहुत दिलचस्पी है और सभी पुराने content जो Biography और History से जुड़े हो मैं आपके साथ शेयर करती रहूंगी.

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