https://www.googletagmanager.com/gtag/js?id=UA-86233354-15
Biography Hindi

डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर की जीवनी – V. S. Wakankar Biography Hindi

डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर भारत के एक प्रमुख पुरातात्विद थे। उन्होंने भोपाल के पास भीमबेटका का एक प्राचीन शिला चित्रों की जांच पड़ताल की थी। अनुमान है कि, यह चित्र लगभग 1,75,000 वर्ष पुराने हैं। वे संस्कार भारती से संबंध रखते थे। तो आइए आज हम इस आर्टिक में हम आपको डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर की जीवनी – V. S. Wakankar Biography Hindi के बारे में बताएंगे.

डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर की जीवनी – V. S. Wakankar Biography Hindi

डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर की जीवनी

जन्म

डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्म 4 मई 1919 को नीमच, जिला मंदसौर, मध्य प्रदेश में हुआ। डॉ विष्णु श्रीधर को हरिभाऊ के नाम से भी जाना जाता था है।

शिक्षा

डॉ विष्णु वाकणकर की इतिहास, पुरातत्व और चित्रकला में विशेष रूचि होने के कारण प्राथमिक शिक्षा पूरी करके उज्जैन आ गए और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से उन्होंने पढ़ाई पूरी की। इसके बाद में वे वहां पर ही प्रोफेसर बन गए।

योगदान

उज्जैन के पास दत्तेवाड़ा गांव में हुई खुदाई के समय उन्होंने काफी मेहनत की। 1998 में हरिभाऊ एक बार रेल की यात्रा कर रहे थे, कि रास्ते में उन्होंने कुछ गुफाओं और चट्टानों को देखा। उन्हे अपने साथी  यात्रियों से पूछने पर पता लगा कि यह भीमबेटका (भीम बैठका) नामक स्थान है तथा यहां गुफा की दीवारों पर कुछ चित्र बने हैं, लेकिन जंगली पशुओं के डर के कारण वहां पर कोई नहीं जाता। हरीभाऊ की आंखों में यह सब सुनकर एक अलग-सी चमक आ गई और जब रेल धीमी हुई तो वह चलती गाड़ी से ही कूद गए और कई घंटे की चढ़ाई चढ़कर उन पहाडि़यों पर जा पहुंचे। इस तरह उन्होंने पहली बार इन चित्रों से संसार का परिचय करवाया।

श्री वाकणकर ने ही लुप्त हुई सरस्वती नदी के भूमिगत मार्ग को सेटेलाइट की मदद से खोजा। केंद्रीय भूमितल जल प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ डी.के. चड्ढा ने जुलाई 1999 में जैसलमेर के पास 8 क्षेत्रों में शुरू हुए विस्तृत उपग्रहीय तथा भूभौतिकीय आलेखों के आधार पर  सरस्वती परियोजना के इन परिणामों की घोषणा की कि भूमि के नीचे30 से 60 मीटर की गहराई में सरस्वती नदी का पुरातन जलमार्ग मौजूद है और इस दिशा में स्व. बाबा साहब आपटे और स्व.मोरोपंत पिंगले से प्रेरणा प्राप्त कर पद्मश्री डा. वी.एस. वाकणकर ने इतिहास संकलन परियोजना के माध्यम से प्रयास आरंभ किए। उन्होंने समर्पित शोधकर्ता के एक दल को एक साथ सरस्वती नदी के किनारे 1 महीने की लंबी सर्वेक्षण यात्रा में पुरातत्वविद्, भूवैज्ञानिकहिमालयन विशेषज्ञ, लोक कलाकारों छायाकार सम्मिलित थे। यजुर्वेद की वाजस्नेयी संहिता 34.11 में कहा गया है कि 5 नदियां अपने पूरी धारा के साथ सरस्वती नदी में मिल जाती है। यह पांच नदियां पंजाब की सतलुज, रावी, व्यास, चेनाव तथा दृष्टावती हो सकती है। डॉ. वाकणकर के अनुसार पांच नदियों के संगम के सूखे हुए अवशेष राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर के पास पंचभद्र तीर्थ  पर देखे जा सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण डॉक्टर वाकणकर के असमय निधन के कारण इसमें बाधा पड़ गई।

संघ के स्वयंसेवक होने के नाते वे सामाजिक क्षेत्र में भी काफी सक्रिय थे। डॉ विष्णु श्रीधर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष रहे। 1966 विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के बाद प्रयाग में प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन हुआ तो श्री एकनाथ रानाडे ने उन्हे वहाँ पर भेजा। इसके बाद में डॉक्टर विष्णु श्रीधर देश के कई अन्य हिस्सों में गए। उन्होंने वहां पर भारतीय संस्कृति कला, इतिहास और ज्ञान विज्ञान के विषय पर अपना भाषण दिया।  1981 में ‘संस्कार भारती’ की स्थापना होने पर उन्हें उसका महामंत्री बनाया गया

पाषाण कालीन गुफाएं

हरिभाऊ द्वारा खोजी गई गुफाओं में बनी चित्रकृतियां पाषाण कालीन मनुष्य के जीवन को दर्शाती है। यहां पर करीब 500 गुफाएँ है।  भीमबैटका मैं अधिकतर तस्वीरें लाल और सफेद रंग से तैयार की गई है। उनमें कहीं -कहीं पीले और हरे रंग के बिंदुओं का प्रयोग भी किया गया है। गुफाओं में वन्य प्राणियों के शिकार दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र भी उकेरे गए हैं। इससे यह पता चलता है कि यहाँ पर मनुष्य रहता था जो ये चित्र उकेरता था।

चित्रों के विषय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में आने के बाद उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में और सामाजिक और शैक्षिक स्थान कार्य किया लगभग 50 वर्षों तक जंगलों में पैदल घूम कर कई प्रकार के हजारों चित्रित से राशियों का पता लगाकर उन्हें कॉपी बनाई तथा देश- विदेश में पर विस्तार से लिखा, भाषण दिए और प्रदर्शनी लगाई प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व के चित्र में डॉक्टर मानकर ने अपने बहु विध योगदान से अनेक नए पथ का सूत्रपात किया संस्कार भारती ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए।

यहां पर 750 शैलाश्रय हैं जिनमें 500 शैलाश्रय चित्रों द्वारा सजाया गया हैं। पूर्व पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र बना रहा। यह बहुमूल्य धरोहर अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। भीमबैटका क्षेत्र में प्रवेश करते हुए शिलाओं पर लिखी हुई कई जानकारियां मिलती हैं। यहां के शैल चित्रों के विषय मुख्यतया सामूहिक नृत्य, रेखांकित मानवाकृति, शिकार, पशु-पक्षी, युद्ध और प्राचीन मानव जीवन के दैनिककार्यो से जुड़े हुई हैं। चित्रों में खनिज रंगों में मुख्य रूप से गेरुआ, लाल और सफेद रंगों का प्रयोग किया गया हैं और कहीं-कहीं पीला और हरा रंग भी प्रयोग हुआ है। यहां की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे। इस प्रकार भीम बैठका के प्राचीन मानव के संज्ञानात्मक विकास का कालक्रम विश्व के अन्य प्राचीन समानांतर स्थलों से हजारों वर्ष पूर्व हुआ था। इस प्रकार से यह स्थल मानव विकास का आरंभिक स्थान भी माना जाता है।

अवॉर्ड

1975 में उन्हें पदम श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया. इस महान कलाविद, पुरातत्ववेता, शोधकर्ता, इतिहासकार, महान चित्रकार का जन्म शताब्दी वर्ष 4 मई 2019 से 3 मई 2020 तक मनाने का निर्णय लिया गया है। इस विश्व विख्यात कला साधक की एक सच्ची श्रद्धांजलि है।

मृत्यु

3 अप्रैल, 1988 में उनका असमय निधन हो गया था ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
Close